अयोध्या न्यूज डेस्क: श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को राम मंदिर के लिए मिले दान में कथित हेराफेरी (embezzlement) के मामले ने एक बड़ा कानूनी और संवैधानिक विवाद खड़ा कर दिया है। उत्तर प्रदेश के फैजाबाद/अयोध्या बार एसोसिएशन द्वारा इस मामले के आरोपियों का केस न लड़ने के लिए पारित किया गया प्रस्ताव देश के कानून, सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के नियमों का खुला उल्लंघन है।
इस पूरे कानूनी परिदृश्य और विवाद के मुख्य पहलुओं को हम निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझ सकते हैं:
1. बार एसोसिएशन का विवादित प्रस्ताव
अयोध्या बार एसोसिएशन ने हाल ही में एक प्रस्ताव पारित कर अपने सदस्यों पर यह पाबंदी लगा दी है कि कोई भी वकील मंदिर के फंड की हेराफेरी के आरोपियों की पैरवी नहीं करेगा। प्रस्ताव में यह भी शर्त जोड़ी गई है कि यदि कोई वकील फिर भी केस लड़ना चाहता है, तो उसे एसोसिएशन से अनुमति लेनी होगी और प्रति आरोपी 5 लाख रुपये एसोसिएशन के खाते में जमा करने होंगे। कानूनन इस तरह का कोई भी वित्तीय प्रतिबंध या रोक पूरी तरह से अवैध है।
2. वकील के कर्तव्य और BCI के नियम
बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के 'पेशेवर आचरण और शिष्टाचार के मानक' (Standards of Professional Conduct and Etiquette) के अनुसार, एक वकील अपने कार्यक्षेत्र की अदालत में किसी भी मुवक्किल (client) का केस स्वीकार करने के लिए बाध्य है।
वकील केवल विशेष परिस्थितियों में (जैसे पहले से किसी अन्य केस में व्यस्त होना) ही केस मना कर सकता है।
किसी अपराध की प्रकृति या आरोपी के प्रति अपनी व्यक्तिगत राय के आधार पर कोई भी वकील केस लड़ने से इनकार नहीं कर सकता।
नियमों में स्पष्ट है कि वकील की निष्ठा कानून के प्रति है, जो यह मांग करता है कि बिना पर्याप्त सबूत के किसी को सजा न मिले।
3. सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले और नजीरें
भारत की सर्वोच्च अदालत ने समय-समय पर बार एसोसिएशनों के ऐसे प्रस्तावों को कड़ी फटकार लगाई है:
ए.एस. मोहम्मद रफी बनाम तमिलनाडु राज्य (2010): सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि किसी भी बार एसोसिएशन द्वारा किसी आरोपी का केस न लड़ने का प्रस्ताव पारित करना संविधान, कानून और पेशेवर नैतिकता के खिलाफ है। अदालत ने ऐसे प्रस्तावों को "कानूनी बिरादरी के लिए कलंक" (disgrace to the legal community) बताते हुए इन्हें 'शून्य और अमान्य' (null and void) घोषित किया था। कोर्ट ने यहाँ तक कहा था कि जब नाजी युद्ध अपराधियों को भी वकील मिले थे, तो भारत में किसी भी आरोपी को इससे वंचित नहीं किया जा सकता।
सूबेदार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2021): 3 जजों की बेंच ने माना कि किसी वकील के माध्यम से प्रतिनिधित्व पाने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के तहत 'ड्यू प्रोसेस' (उचित प्रक्रिया) का हिस्सा है।
रूपाश्री एच.आर. बनाम कर्नाटक राज्य (2024): सुप्रीम कोर्ट ने मैसूर बार एसोसिएशन के ऐसे ही एक प्रस्ताव को खारिज करते हुए दोहराया कि खुद का बचाव करना एक मौलिक अधिकार है।
4. कसाब से लेकर निर्भया के दोषियों तक का उदाहरण
भारतीय न्याय व्यवस्था इस सिद्धांत पर टिकी है कि 'किसी भी व्यक्ति को बिना सुने दोषी नहीं ठहराया जा सकता' (Audi Alteram Partem)। इसी प्रतिबद्धता के कारण देश के इतिहास के सबसे जघन्य मामलों में भी कानूनी प्रतिनिधित्व दिया गया:
महात्मा गांधी के हत्यारे नथुराम गोडसे, 2008 मुंबई हमलों के आतंकी अजमल कसाब और 2012 के निर्भया सामूहिक बलात्कार के दोषियों तक को अदालत में अपनी बात रखने के लिए कानूनी सहायता (Amicus Curiae या निजी वकील) प्रदान की गई थी।
इस संदर्भ में देश के वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन (जिन्होंने कसाब और निर्भया के दोषियों की पैरवी की थी) की टिप्पणी बेहद प्रासंगिक है, जिसमें उन्होंने कहा कि अयोध्या बार एसोसिएशन का यह कदम आरोपियों के संवैधानिक अधिकार का हनन करता है। राम मंदिर दान चोरी मामले में जिन 8 लोगों पर चोरी, धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश के आरोप हैं, उन्हें भी कानूनन अपनी पसंद का वकील चुनने या मुफ्त कानूनी सहायता (Article 39A) पाने का पूरा अधिकार है।